शास्त्र विरुद्ध भक्ति और नास्तिकता
नास्तिक कौन होता है ? - जो व्यक्ति किसी परा-प्राकृतिक अस्तित्व जैसे ईश्वर, शैतान, पैगंबर, अवतार, जिन्न, भूत वगैरह में 'प्रमाण की अनुपस्थिति' के आधार पर विश्वास करने से इंकार करता है वह नास्तिक होता है। क्योंकि गलत भक्ति करने के कारण जो लाभ मिलना चाहिए उनको वह लाभ तो मिलता नहीं फिर नास्तिक बनते जाते हैं श्रीमद्भगवत गीता जी के अध्याय 16 श्लोक 23-24 में सपष्ट निर्देश है कि जो साधक शास्त्रों में वर्णित भक्ति की क्रियाओं के अतिरिक्त साधना व क्रियाऐं करते हैं, उनको न सुख की प्राप्ति होती है, न सिद्धी यानि आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है, न उनको गति यानि मोक्ष की प्राप्ति होती हैं अर्थात व्यर्थ पूजा है | वह नही करनी चाहिए क्योंकि साधक इन तीन लाभों के लिए ही परमात्मा की भक्ति करता है | इसलिए वे धार्मिक क्रियाऐं त्याग देनी चाहिऐं जो गीता तथा वेदों जैसे प्रभुदत्त शास्त्रो मे वर्णित नही है | उपरोक्त मूर्ति पूजा का वेदों तथा गीता में उल्लेख न होने से शास्तरविरूद्द साधना है | वर्तमान में पूरे विश्व में ( संत रामपाल जी महाराज) के अतिरिक्त शास्त्रो के अनुसार सम्पूर्ण अध्यातम ज्ञान...